10 Best Poems for Kids in Hindi | बाल दिवस पर चुनिन्दा बाल कविताएँ

5 Best Poems for Kids in Hindi: Hello friends, Children’s Day is celebrated every year on 14th November and it is a special day when we praise the preciousness of children and their dedication. This day is celebrated as the birthday of Pandit Jawaharlal Nehru, who himself was a lover of children and according to his saying, “Children are my future”.

On the occasion of this day, various programs are organized in schools and communities to develop the spirit of leadership and tolerance in children. Celebrating this unique day with great enthusiasm with lively programs and games regarding children establishes children as important and dedicated members of our society.

In today’s article, we have brought poems on Children’s Day, बाल कविताएँ, 10 Best Poems for Kids in Hindi, बच्चों की 10 मजेदार बाल कविताएं, प्रसिद्ध बाल कविताएँ, Baal Kavita Hindi, Children’s Poems in Hindi which you will definitely like.

10 Best Poems for Kids in Hindi | बाल दिवस पर चुनिन्दा बाल कविताएँ

Best Poems for Kids in Hindi
Best Poems for Kids in Hindi

1: कहाँ रहेगी चिड़िया? (प्रसिद्ध बाल कविताएँ)

आंधी आई जोर-शोर से,
डाली टूटी है झकोर से,
उड़ा घोंसला बेचारी का,
किससे अपनी बात कहेगी?
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ?

घर में पेड़ कहाँ से लाएँ?
कैसे यह घोंसला बनाएँ?
कैसे फूटे अंडे जोड़ें?
किससे यह सब बात कहेगी,
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ?

– महादेवी वर्मा

2: चांद का कुर्ता (Best Poems for Kids in Hindi)

हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला,
सिलवा दो मां मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।

सनसन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूं,
ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूं।

आसमान का सफ़र और यह मौसम है जाड़े का,
न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही कोई भाड़े का।

बच्चे की सुन बात कहा माता ने, ‘‘अरे सलोने!
कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।

जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ,
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ।

कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,
बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा।

घटता-बढ़ता रोज़ किसी दिन ऐसा भी करता है,
नहीं किसी की भी आंखों को दिखलाई पड़ता है।

अब तू ही ये बता, नाप तेरा किस रोज़ लिवाएं,
सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आए।

– रामधारी सिंह ‘दिनकर’

3: आओ प्यारे तारो आओ (बाल कविताएं)

आओ प्यारे तारो आओ
तुम्हें झुलाऊँगी झूले में,
तुम्हें सुलाऊँगी फूलों में,
तुम जुगनू से उड़कर आओ,
मेरे आँगन को चमकाओ।

– महादेवी वर्मा

4: चन्दा मामा (Baal Kavita Hindi)

चन्दा मामा दौड़े आओ,
दूध कटोरा भर कर लाओ ।
उसे प्यार से मुझे पिलाओ,
मुझ पर छिड़क चाँदनी जाओ ।

मैं तैरा मृग छौना लूँगा,
उसके साथ हँसूँ खेलूँगा ।
उसकी उछल कूद देखूँगा,
उसको चाटूँगा चूमूँगा ।

– अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

5: रेल (Children’s Poems in Hindi)

आओ हम सब खेलें खेल
एक दूसरे के पीछे हो
लम्बी एक बनायें रेल ।

जो है सबसे मोटा-काला
वही बनेगा इंजनवाला;
सबसे आगे जायेगा,
सबको वही चलायेगा ।

एक दूसरे के पीछे हो
डिब्बे बाक़ी बन जायें,
चलें एक सीधी लाइन में
झुकें नहीं दायें, बायें ।

सबसे छोटा सबसे पीछे
गार्ड बनाया जायेगा,
हरी चलाने को, रुकने को
झण्डी लाल दिखायेगा ।

जब इंजनवाला सीटी दे
सब को पाँव बढ़ाना है,
सबको अपने मुँह से ‘छुक-छुक
छुक-छुक’ करते जाना है ।

– हरिवंशराय बच्चन

6: यह कदम्ब का पेड़ (बाल दिवस पर कविताएं)

यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।

ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली।
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।

तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता।
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता।

वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता।
अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता।

बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता।
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता।

तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे।
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे।

तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता।
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता।

तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती।
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं।

इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे।
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।

– सुभद्रा कुमारी चौहान

7: एक बचपन का जमाना था (बाल कविताएँ)

एक बचपन का जमाना था
जिस में खुशियों का खजाना था

चाहत चाँद को पाने की थी
पर दिल तितली का दिवाना था

खबर ना थी कुछ सुबहा की
ना शाम का ठिकाना था

थक कर आना स्कूल से
पर खेलने भी जाना था

माँ की कहानी थी
परीयों का फसाना था

बारीश में कागज की नाव थी
हर मौसम सुहाना था

हर खेल में साथी थे
हर रिश्ता निभाना था

गम की जुबान ना होती थी
ना जख्मों का पैमाना था

रोने की वजह ना थी
ना हँसने का बहाना था

क्युँ हो गऐे हम इतने बडे,
इससे अच्छा तो वो बचपन का जमाना था।

– कोमल प्रसाद साहू

8: इम्तिहान से छुट्टी पाई (Best Poems for Kids in Hindi)

बौड़मजी ने इम्तिहान में
खूब अक्ल का जोर लगाया
अगली-बगली रहे झाँकते
फिर भी एक सवाल न आया।

गिनते रहे हॉल की कड़ियाँ
यों ही घंटे तीन बिताए
कोरी कापी वहीं छोड़कर
हँसी-खुशी वापस घर आए।

आकर खूब कबड्डी खेले
फिर यारों में गप्प लड़ाई
मौज-मजे से दिन गुजारकर
इम्तिहान से छुट्टी पाई।

– कन्हैयालाल मत्त

9: टेसू राजा अड़े खड़े (प्रसिद्ध बाल कविताएँ)

टेसू राजा अड़े खड़े
माँग रहे हैं दही बड़े।

बड़े कहाँ से लाऊँ मैं?
पहले खेत खुदाऊँ मैं
उसमें उड़द उगाऊँ मैं
फसल काट घर लाऊँ मैं
छान फटक रखवाऊँ मैं

फिर पिट्ठी पिसवाऊँ मैं
चूल्हा फूँक जलाऊँ मैं
कड़ाही में डलवाऊँ मैं
तलवार सिकवाऊँ मैं।

फिर पानी में डाल उन्हें
मैं लूँ खूब निचोड़ उन्हें
निचुड़ जाएँ जब सबके सब
उन्हें दही में डालूँ तब।

नमक मिरच छिड़काऊँ मैं
चाँदी वरक लगाऊँ मैं
चम्मच एक मँगाऊँ मैं
तब वह उन्हें खिलाऊँ मैं।

– रामधारी सिंह दिनकर

10: अक्कड़ मक्कड़ (Children’s Poems in Hindi)

अक्कड़ मक्कड़,धूल में धक्कड़
दोनों मूरख, दोनों अक्खड़
हाट से लौटे, ठाठ से लौटे
एक साथ एक बाट से लौटे।

बात-बात में बात ठन गयी
बाँह उठीं और मूछें तन गयीं
इसने उसकी गर्दन भींची
उसने इसकी दाढ़ी खींची।

अब वह जीता, अब यह जीता
दोनों का बढ चला फ़जीता
लोग तमाशाई जो ठहरे
सबके खिले हुए थे चेहरे

मगर एक कोई था फक्कड़
मन का राजा जेब से कक्कड़
बढा भीड़ को चीर-चार कर
बोला ‘ठहरो’ गला फाड़कर।

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़
दोनों मूरख, दोनों अक्खड़
गर्जन गूँजी, रुकना पड़ा
सही बात पर झुकना पड़ा

उसने कहा सधी वाणी में
डूबो चुल्लू भर पानी में
ताकत लड़ने में मत खोओ
चलो भाईचारे को बोओ

खाली सब मैदान पड़ा है
आफ़त का शैतान खड़ा है
ताकत ऐसे ही मत खोओ
चलो भाईचारे को बोओ

सुनी मूर्खों ने जब यह वाणी
दोनों हुए पानी-पानी
लड़ना छोड़ा अलग हट गए
लोग शर्म से गले, छट गए।

सबको नाहक लड़ना अखरा
ताक़त भूल गई तब नखरा
गले मिले तब अक्कड़-बक्कड़
ख़त्म हो गया धूल में धक्कड़

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़
दोनों मूरख, दोनों अक्खड़।

– भवानीप्रसाद मिश्र

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