Maithilisharan Gupt ki Kavita | मैथिलीशरण गुप्त की 5 प्रसिद्ध कविताएँ

Maithilisharan Gupt ki Kavita | मैथिलीशरण गुप्त की 5 प्रसिद्ध कविताएँ: Hello friends, Maithili Sharan Gupt was born on 3 August 1886 in Chirgaon near Jhansi. An interesting story is that his childhood name was ‘Mithiladeep Nandansharan’ but as such a big name was not acceptable in the school register, it was changed to ‘Maithilisharan’. Due to being born in a wealthy Vaishya family, ‘Gupta’ was included in the name.

In his childhood, he used to write Chhappay under the name ‘Swarnalata’, then in adolescence he started using the names ‘Rasikesh’, ‘Rasikendu’ etc. He did translation work under the name ‘Madhup’ and wrote poems against the British government under the names ‘Bharatiya’ and ‘Nityanand’. The literary world used to call him ‘Dadda’.

His work ‘Bharat-Bharati’ (1912) proved to be widely influential during the freedom struggle and that is why Mahatma Gandhi gave him the title of ‘Rashtrakavi’.

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Maithilisharan Gupt ki Kavita
Maithilisharan Gupt ki Kavita

1: नर हो, न निराश करो मन को (maithili sharan gupt ki kavita in hindi)

नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को।

संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को।

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को।

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को।

प्रभु ने तुमको कर दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को।

किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को।

करके विधि वाद न खेद करो
निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो।

2: चारुचंद्र की चंचल किरणें (maithilisharan gupt ki kavita)

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से
मानों झूम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से

पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना
जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर-वीर निर्भीकमना
जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है
भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है

किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये
राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये
बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है
जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है

मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है
तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है
वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी
विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी

कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता
आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता
बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी
मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई

क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा
है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा
बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप
पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप

है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर
रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर
और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है
शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है

सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है
अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है
अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है
पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है

तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात
वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात
अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की
किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की

और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे
व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे
कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक
पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक

3: भारत माता का मंदिर यह (maithili sharan gupt ki desh bhakti kavita)

भारत माता का मंदिर यह
समता का संवाद जहाँ,
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

जाति-धर्म या संप्रदाय का
नहीं भेद-व्यवधान यहाँ
सबका स्वागत, सबका आदर
सबका सम सम्मान यहाँ
राम, रहीम, बुद्ध, ईसा का
सुलभ एक सा ध्यान यहाँ
भिन्न-भिन्न भव संस्कृतियों के
गुण गौरव का ज्ञान यहाँ ।

नहीं चाहिए बुद्धि बैर की
भला प्रेम का उन्माद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

सब तीर्थों का एक तीर्थ यह
ह्रदय पवित्र बना लें हम
आओ यहाँ अजातशत्रु बन
सबको मित्र बना लें हम
रेखाएँ प्रस्तुत हैं, अपने
मन के चित्र बना लें हम
सौ-सौ आदर्शों को लेकर
एक चरित्र बना लें हम ।

बैठो माता के आँगन में
नाता भाई-बहन का
समझे उसकी प्रसव वेदना
वही लाल है माई का
एक साथ मिल बाँट लो
अपना हर्ष विषाद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

मिला सेव्य का हमें पुज़ारी
सकल काम उस न्यायी का
मुक्ति लाभ कर्तव्य यहाँ है
एक एक अनुयायी का
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
उठे एक जयनाद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

4: सरकस (Poems of Maithili Sharan Gupt)

होकर कौतूहल के बस में
गया एक दिन मैं सरकस में
भय-विस्मय के खेल अनोखे
देखे बहु व्यायाम अनोखे।

एक बड़ा-सा बंदर आया
उसने झटपट लैम्प जलाया
डट कुर्सी पर पुस्तक खोली
आ तब तक मैना यौं बोली

हाजिर है हजूर का घोड़ा
चौंक उठाया उसने कोड़ा
आया तब तक एक बछेरा
चढ़ बंदर ने उसको फेरा

टट्टू ने भी किया सपाटा
टट्टी फाँदी, चक्कर काटा
फिर बंदर कुर्सी पर बैठा
मुँह में चुरट दबाकर ऐंठा

माचिस लेकर उसे जलाया
और धुआँ भी खूब उड़ाया
ले उसकी अधजली सलाई
तोते ने आ तोप चलाई

एक मनुष्य अंत में आया
पकड़े हुए सिंह को लाया
मनुज-सिंह की देख लड़ाई
की मैंने इस भाँति बड़ाई

कहीं साहसी जन डरता है
नर नाहर को वश करता है
मेरा एक मित्र तब बोला
भाई तू भी है बम भोला

यह सिंही का जना हुआ है
किंतु स्यार यह बना हुआ है
यह पिंजड़े में बंद रहा है
नहीं कभी स्वच्छंद रहा है

छोटे से यह पकड़ा आया
मार-मार कर गया सिखाया
अपनेको भी भूल गया है
आती इस पर मुझे दया है।

5: माँ कह एक कहानी (मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध कविताएँ)

माँ कह एक कहानी
बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?
“कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी
कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी?
माँ कह एक कहानी।

“तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे
तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभि मनमानी
“जहाँ सुरभि मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।

वर्ण वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिंदु झिले थे
हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी
“लहराता था पानी, हाँ-हाँ यही कहानी।”

“गाते थे खग कल-कल स्वर से, सहसा एक हंस ऊपर से
गिरा बिद्ध होकर खग शर से, हुई पक्षी की हानी
“हुई पक्षी की हानी? करुणा भरी कहानी

चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया
इतने में आखेटक आया, लक्ष सिद्धि का मानी
“लक्ष सिद्धि का मानी! कोमल कठिन कहानी।

“मांगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी
तब उसने जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी
“हठ करने की ठानी! अब बढ़ चली कहानी।

हुआ विवाद सदय निर्दय में, उभय आग्रही थे स्वविषय में
गयी बात तब न्यायालय में, सुनी सभी ने जानी
“सुनी सभी ने जानी! व्यापक हुई कहानी।

राहुल तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका
कह दे निर्भय जय हो जिसका, सुन लँ तेरी बानी
“माँ मेरी क्या बानी? मैं सुन रहा कहानी।

कोई निरपराध को मारे तो क्यों अन्य उसे न उबारे
रक्षक पर भक्षक को वारे, न्याय दया का दानी
“न्याय दया का दानी! तूने गुनी कहानी।

मित्रो आशा करता हूँ कि मैथिलीशरण गुप्त की 5 प्रसिद्ध कविताएँ, Poems of Maithili Sharan Gupt, मैथिलीशरण गुप्त की 5 कविता, maithili sharan gupt ki desh bhakti kavita, maithilisharan gupt ki kavita आपको जरुर पसंद आई होगी

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